श्रीकृष्ण की वृन्दावन का इतिहास

, by kiran sharma

वृन्दावन का इतिहास -

भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओ से जुड़ा एक आध्यात्मिक और रमणीक स्थान, जो स्थित है उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले में। पुराणों और ग्रन्थों में इसे श्रीकृष्ण की बाललीलाओं का मुख्य स्थान बताया गया है।
               वृन्दावन, मथुरा से करीब १५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है,जहाँ कृष्ण और राधाजी के कई संख्या में विशाल और भव्य मंदिर बने हुए है। इसके अलावा यहाँ कृष्णा-बलराम,रंगनाथ जी और प्रेम मंदिर प्रमुख है। महाकवि कालिदास ने भी अपनी पुस्तक रघुवंश में वृन्दावन की मनोरम छटा का बड़ा ही सूंदर वर्णन किया है। विष्णुपुराण और श्रीमद्भगवत्गीता में भी एक प्रसंग है जिसके अनुसार नन्द जी कंस के अत्याचारो से बचने के लिए इस स्थान पर आए थे,और बाद में वसुदेवजी ने कृष्ण को यहाँ उनके घर छोड़ा था। किन्तु एक जनश्रुति तो ये भी है कि आज का वृन्दावन, उस प्राचीन वृन्दावन से कोई मेल नहीं खाता और ना ही ये श्रीकृष्ण वाला वृन्दावन है।
पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण का वृन्दावन, गोवर्धन पर्वत के निकट था और तीनो और से यमुना नदी से घिरा था, और श्रीपद्म पुराण में तो इस स्थान को भगवन का साक्षात् शरीर कहा गया है।
                             ऐसा माना जाता है कि चैतन्य महाप्रभु ने  15वीं शताब्दी में अपनी दिव्य बुद्धि द्वारा श्रीकृष्ण से सम्बंधित स्थानों को पहचाना था, किन्तु उसके कुछ समय पश्चात ही वो सब लुप्त हो गयी। कहते है कि जिन महापुरुषों और संतो ने अपनी सामर्थ्य अनुसार जब भी किसी स्थल का या किसी भवन का पता किया, उसके तुरन्त बाद या कुछ समय बाद ही वो सब पुनः लुप्त हो गए। वर्त्तमान में स्थित वृंदावन के प्राचीन मंदिरो का निर्माण महाराजा मानसिंह द्वारा कराया गया है,जो सम्राट अकबर के समकालीन थे।

                        बसंत और श्रावण समय में यहाँ की छठा बहुत ही मनमोहक और सूंदर होती है। यमुना नदी के किनारे अनेक प्रसिद्द घाट है जिनमे वराहघाट, युगलघाट, और श्री गोविंदघाट प्रमुख है। गोविन्द घाट के बारे में एक किवंदती प्रचलित है कि रासमण्डल से अन्तर्धान होने पर श्रीकृष्ण, गोपियो के समक्ष इसी घाट पर पुनः आविर्भूत हुए थे।



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