वैष्णोदेवी का इतिहास

, by kiran sharma

वैष्णोदेवी-

 "वैष्णोदेवी-धाम ",माँ वैष्णवी को समर्पित एक पवित्र हिन्दू स्थान है। वैष्णोदेवी स्थित है भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य की प्राकृतिक वादियो में,कटारा जिले के निकट।उत्तर-भारत के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। यह मंदिर समुद्र तल से करीब 5200 फ़ीट की ऊँचाई पर तथा कटारा जिले से १२क़िलोमीटर की दुरी पर अवस्थित है। तीन देवियो- माँ सरस्वती,माँ काली,और माँ लक्ष्मी को संयुक्त रूप से वैष्णोदेवी कहा जाता है। 
  इस मंदिर तक पहुचने के लिए कटारा से उधमपुर तक रेल सम्पर्क भी उपलभ्ध है। और इस मंदिर की समस्त देखरेख श्रीवैष्णोदेवी ट्रस्ट के द्वारा की जाती है। कहा जाता है की वैष्णोदेवी के दर्शन मात्र से ही भक्तो की सारी मुरादे पूरी हो जाती है। और मातारानी जिसे भी बुलाना चाहती हो वह किसी न किसी माध्यम से यहाँ पहुच ही जाता है। यहाँ प्रतिवर्ष लाखो की संख्या में शृद्धालु आते है। 
                     वैष्णोदेवी का निवास त्रिकुट पर्वत पर स्थित एक गुफा में माना जाता है, और ये भी कहा जाता है कि मंदिर में जो मूर्तिया अभी है,और स्वयंभू नहीं है,और स्वयंभू मूर्तियों को भारत सरकार द्वारा गुफाओ में बंद कर दिया गया है। यात्रा की शुरुआत कटारा जिले से होती है,और यही से आगे की यात्रा के लिए पर्चे भी मिलते है।

वैष्णोदेवी का इतिहास - 

माता वैष्णोदेवी के बारे में कई कथाये और कहानियां प्रचलित है ,किन्तु पौराणिक मान्यताओ के अनुसार अपने एक भक्त श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर ही माँ वैष्णवी ने उसकी लाज राखी और विश्व को अपने होने का साक्षात् प्रमाण दिया। माता की इस कृपा से अभिभूत होकर श्रीधर ने गाँव में भंडारा रखा और सभी ग्रामवासियो और संतो को आमंत्रण दिया। उसने श्रीभैरव को भी उनके शिस्यो के साथ निमंत्रणभेजा दिया। भोजन के लिए भैरव ने सात्विक भोग के स्थान पर मांस का प्रस्ताव रखा किन्तु भक्त ने उसे अस्वीकार कर दिया। भक्त की ख़ुशी की खातिर माँ एक साधारण कन्या के रूप में भंडारे में आई, और भैरवनाथ को समझने का बहुत प्रयत्न किया,किन्तु वह अपनी हठ पर अड़ा रहा। भैरव ने जब उस कन्या को पकड़ना चाहा तो वह त्रिकुट पर्वत पर पहुच गयी हनुमान को बुलाकर कहा कि मैं इस गुफा में नौ माह के लिए तप करने जा रही हु तब तक तुम भैरव का ध्यान भटकाए रखना। माता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने  ऐसा  ही किया।  भैरव का संहार करने के  बाद उसे एक वरदान भी दिया की जो भी मेरे दर्शनों के लिए यहाँ आएगा उसे तुम्हारे दर्शन भी करने होंगे अन्यथा उसका पूजन अधूरा माना जाएगा।

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