kya thi saibaba ki history

, by kiran sharma

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शिरडी के साईंबाबा 

"श्री अनंतकोटी ब्रह्माण्ड नायक राजाधिराज योगिराज परब्रह्म सद्गुरु श्री साईनाथ महाराज की जय"

साईबाबा,एक समपन्न योगी, एक फ़क़ीर जिसने शिरडी में आकर अपना डेरा जमाया, लेकिन वो कौन था,किस मजहब का था,कहा से आया था ये कोई नहीं जानता था। वो एक सिद्ध योगी थे,उनके भक्त उन्हें भगवान् का एक अवतार मानते थे,और हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही उनके सेवा में लगे रहते थे। मानव मात्र की निष्काम सेवा और अपने आध्यात्मिक चमत्कारों से दूर दूर तक प्रसिद्ध थे।
                       उनके वास्तविक घर-परिवार और जन्म के बारे में तो कोई नहीं जानता लेकिन सन 1835 में एक 16 वर्ष की आयु का बालक अहमदनगर से होते हुए शिरडी गाव में आया,और गाव में स्थित एक नीम के पेड़ के नीचे बैठकर अपना तपस्वी जीवन का आरम्भ किया। गाव वालो के पूछने पर बस इतना बताया कि ये ग्राम उनका गुरु स्थान है,और अब वे यही अपना तपस्वी जीवन बिताएंगे। उनकी तपस्या से प्रभावित होकर कई लोग उनके दर्शन के लिए आते,तो कई लोग उन्हें पागल कहकर पत्थर भी फेंकते। किन्तु साई इन सब बातों से परे अपनी साधना में  लीन रहते। 
                         और एक दिन वो योगी शिरडी को छोड़कर कही अचानक चला गया, जिसका किसी को पता भी नहीं पड़ा। लेकिन १ वर्ष पश्चात् एक शादी के बारात में शरीक होकर साई वापस इस शिरडी में पधारे और फिर हमेशा के लिए यही बस गए। 
                       शिरडी आकर उन्होंने एक जर्जर सी मस्जिद को अपना निवास बनाया, और उसे नाम दिया " द्वारिकामाई". लोगो से भिक्षा मांगकर ही साई अपना गुज़ारा करते थे। उस मस्जिद में रौशनी के लिए उन्होंने एक आग जलाई जो आजतक जलती है,और भक्त उसे अखंड ज्योति "धुनि" के नाम से पुकारते है।
              अपने चमत्कारों और आध्यात्मिकता से अब साई केवल के फ़क़ीर नहीं रहे,लेकिन गाव वालो के लिए हाकिम और सद्गुरु भी बन चुके थे। साई का तो  सभी के लिए एक ही उपदेश और सन्देश था कि " सबका मालिक एक ही है"। बाबा ने अपने पीछे न तो कोई अनुयायी छोड़ा न ही कोई अलग पंथ का निर्माण किया। 
      सन 1918 में साईबाबा ने अपने साकार शरीर का त्याग किया,किन्तु अपने भक्तो को जाने के पहले 11 अनमोल और सार्थक वचन देकर गए-
  1. जो शिरडी में आएगा, आपद दूर भगाएगा। 
  2. चढ़े समाधी की सीढ़ी पर,पैर तले दुःख की पीढ़ी पर। 
  3. त्याग शरीर चला जाऊंगा,भक्त हेतु दौड़ा आऊंगा। 
  4. मन में रखना दृढ विश्वास,करे समाधी पूरी आश। 
  5. मुझे सदा जीवित ही जानो, अनुभव करो सत्य पहचानों। 
  6. मेरी शरण आकर \खाली जाए,हो तो कोई मुझे बताये। 
  7. जैसा भाव हुआ जिस जन का, वैसा ही रूप हुआ मेरे मन का। 
  8. भार ये तुम्हारा मुझ पर होगा, वचन न मेरा झूठा होगा। 
  9. आ सहायता लो भरपूर, जो भी माँगा वो नहीं है दूर। 
  10. मुझ में लीन वचन मन काय,उसका ऋण न कभी चुकाया। 
  11. धन्य धन्य वो भक्त अनन्य,मुझे छोड़ जिसे भजे न अन्य। 

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