कोणार्क सूर्य मंदिर दर्शन क्यों हे जरुरी history

, by kiran sharma

कोणार्क सूर्य मंदिर का इतिहास

कोणार्क का सूर्य मंदिर, जिसे भारत का  ब्लैक पैगोडा" भी कहा जाता है, स्थित है ओडिशा राज्य के पूरी जिले में। काले ग्रेफाइट और लाल बलुआ पत्थरो से निर्मित यह मंदिर अपने स्थापय और तकनीक के लिए विश्वप्रसिद्ध है। दर्शन क्यों हे जरुरी 
      इस मंदिर का निर्माण १३वी सदी में गंगवंशीय राजा नरसिंहदेव-प्रथम ने करवाया था। इसे यूनैस्को द्वारा 1984 में विश्व धरोहर में शामिल किया गया था। कलिंग शैली में निर्मित यह भारत का सबसे प्राचीन मंदिरो में से एक है।  इस पूरे मंदिर की बनावट कुछ इस प्रकार है कि लगता है की जैसे सूर्य देव का रथ जिसे 12 जोड़ी चक्र और 7 जोड़े घोड़ो के माध्यम से खिंचा जा रहा है। 

                                         खजुराहो की तरह ही यह मंदिर अपनी कामुक मूर्तियों के लिए विख्यात है।
अनेक बार हुए मुस्लिम आक्रमणों से यह मंदिर का अधिकांश हिस्सा नष्ट हो चूका है, और वर्तमान में ७ में से एक ही जोड़ा घोड़ो का शेष बचा है। मुख्य मंदिर को 3 मंडपो में बनाया गया है, जिसमे से अब एक ही शेष बचा है। 
    यहाँ सूर्य भगवान् की 3 प्रतिमाएं विराजित है जो तीनो रूपो को प्रदर्शित करती है जैसे- 
  • बाल्यवस्था अर्थात उदय होता हुआ सूर्य
  • युवावस्था अर्थात मध्यान समय का सूर्य   और 
  • वृद्धवस्था अर्थात अस्त होता हुआ सूर्य। 
मंदिर के मुख्य द्वार पर दो सिंह,हाथियों पर वार करते दर्शाये गए है। प्रतिमाओ का कुल वज़न करीब 21 टन है। 
मंदिर के दक्षिणी भाग में दो घोड़े बनाये गए है,जो वर्त्तमान उड़ीसा राज्य के प्रतिक है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक नटराज की मूर्ती भी स्थापित है। मंदिर पर बनाई गयी कामुक मूर्तिया, कामसूत्र से ली गयी है। 
         अपने वास्तु-दोषो के कारण ही ये रथ मंदिर अपने निर्माण के मात्र 500 वर्षो में ही ध्वस्त हो गया, जैसे कि आग्नेय कोण में कुँए का होना, और दक्षिण दिशा में एक विशाल द्वार का होना, इत्यादि। इसके निर्माण में १२०० कारीगर और करीब 12 वर्ष का लंबा समय लगा था। 


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