haridwaar story

, by kiran sharma

हरिद्वार का इतिहास 


भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक पवित्र और प्रसिद्द हिन्दू तीर्थ स्थल है हरिद्वार। हरिद्वार का आध्यात्मिक अर्थ होता है "हरी का द्वार" माना हरिद्वार। ये स्थल हिन्दुओ के ७ प्रमुख तीर्थ स्थानों में से एक और बहुत ही रमणीक और सूंदर प्रदेश है। यही से होते हुए गंगा जो कि गोमुख से 253 किलीमीटर की यात्रा करते हुए पहुचती है, यही से अपने मैदानी क्षेत्रो में प्रथम प्रवेश करती है। 
                                             पौराणिक मान्यताओ के अनुसार, हरिद्वार उन स्थानों में से एक है जहा समुद्र मंथन के पश्चात् अमृत की कुछ बूंदे गिरी थी। और इसीलिए यहाँ प्रत्येक 12 वर्ष के अंतराल पर महाकुम्भ का आयोजन किया जाता है जिसमे देश के कई सिद्ध साधु-संत आते है। हरिद्वार के अतिरिक्त अन्य स्थान जहा पर कुम्भ का आयोजन होता है उनमे है - उज्जैन, नासिक और प्रयाग। पूरे विश्व से करोडो की संख्या में शृद्धालु, महाकुम्भ में शामिल होते है।

                                      हरिद्वार में जिस स्थान पर अमृत की बुँदे गिरी थी उस स्थान को आज ब्रह्म-कूंड के नाम से जाना जाता है। और महाकुंभ के समय गंगा नदी में स्नान करना मोक्ष प्राप्ति और पाप-मुक्ति के लिए अनिवार्य माना जाता है। हरिद्वार जिले के रूप में 28 दिसम्बर १९८८ को स्थापित हुआ था और सं २००० में उत्तरखंड राज्य में गठित होने पर इसमें मिलाया गया और यहाँ की जनसंख्या करीब २ लाख 95 हजार है।
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                                           धार्मिक महत्व के अलावा हरिद्वार में उद्योगों का भी तेजी से विकास हो  रहा है। और कई नामी कंपनियों के प्लांट यहाँ निर्मित है।हरिद्वार में कुल ३ तहसील और 6 विकासखंड शामिल है,और इन सभी से मिलकर एक संसदीय सीट है। हरद्वार में विधान सभा की 9 सीट है। 
                                                                   हरिद्वार,प्रकृति-प्रेमियो के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है। यहाँ की लोक संस्कृति भारत का गौरव और सभ्यता का अद्भुत और बहुरूप प्रदर्शित करती है। पुराणों में हरिद्वार को गंगाद्वार,और कपिलवस्तु के नाम से बताया गया है। इसे चारधाम यात्रा का प्रवेश द्वार भी माना जाता है। 
महाभारत में भी हरिद्वार का हरद्वार के नाम से उल्लेख मिलता है। यहाँ के दर्शनीय स्थलों में से एक कपिल-ऋषि का आश्रम भी है। यह वही कपिल मुनि थे जो गंगा को पृथ्वी पर अपने कमण्डल में भर कर लाये थे। और आज इसी गंगा में लोग अपने पूर्वजो की राख का  विसर्जन करके उनकी आत्मा की मुक्ति के लिए प्रार्थना करते है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ के पवित्रो घाटो का निर्माण सम्राट विक्रमादित्य द्वारा कराया गया था। 

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