badrinath dhamn ka itihaas

, by kiran sharma

बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास 

बद्रीनाथ धाम या बद्रीनारायण मंदिर,अलकनंदा नदी के किनारे बसा हुआ एक पवित्र हिन्दू तीर्थस्थल जो समर्पित है भगवान् विष्णु को। हिन्दुओ के चार धाम यात्रा में से एक और महत्वपूर्ण रमणीक स्थान है। बद्रीनाथ धाम स्थित है भारत के उत्तराखंड राज्य में अलकनंदा नदी के किनारे, और ऋषिकेश से उत्तर दिशा में  करीब 295 किलोमीटर की दुरी पर। मुख्य मंदिर में श्री नारायण का पूजन किया  जाता है,और मूर्ती के निकट ही एक अखंड दीप सदा प्रज्वलित रहता है।

                                 शाश्त्र नियमो के अनुसार प्रत्येक हिन्दू को अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार तो श्री बदरीनाथ के दर्शन अवश्य करने ही चाहिए। शीतऋतू में अलकनन्दा में स्नान करना बहुत कठिन  हो जाता है और कई बार तो नदी का पानी हिमाच्छादित हो जाता है। श्रीनारायण को भोग-प्रसाद के रूप में चने की दाल और मिश्री का भोग लगाया जाता है। मूर्ती के बारे में कहा जाता है कि इस मूर्ती की स्थापना स्वयं देवताओ ने एक नारदकुंड से निकालकर की थी। 
                              पौराणिक कथाओ के अनुसार जब श्रीविष्णु ध्यान करने के लिए उचित स्थान की खोज कर रहे थे तब उन्हें ये स्थान बहुत भा गया और इस स्थान पर निवास के लिए एक युक्ति को अपनाया,क्योंकि उससे पहले तक यह धाम शिव-धाम के रूप में प्रख्यात था। श्रीहरि ने एक बालक का रूप धर कर तीव्र वेग से कृन्दन करना शुरू कर दिया, उनके रूदन को सुनकर माँ पर्वती अत्यंत व्याकुल हो गई,और शिव-पार्वती ने उनके समक्ष प्रकट होकर उनके रोने का कारण पूछा। विष्णु ने वर रूप में तप हेतु स्थान मांग लिया,और इस प्रकार आज यह स्थान बद्रीविशाल के नाम से प्रसिद्ध है।
                         मुख्य मंदिर को तीन भागो में विभक्त किया गया है- गर्भ-ग्रह, दर्शन-मंडप,और सभा-मंडप। मंदिर में कुल १५ मूर्तिया स्थापित है,जिनमे ध्यानमुद्रित विष्णु की मूर्ती मुख्य है। मूर्ती के दायीं और कुबेर और लक्ष्मी की मूर्तिया है। बद्रीधाम को पृथ्वी का वैकुण्ठ धाम कहा जाता है। यहाँ एक नियम है की मंदिर का मुख्य पुजारी केरल राज्य का ही होगा। मंदिर के पट मई से अक्टूबर तक ही खुले रहते है। जनश्रुतियो में तो यह भी कहा जाता है की वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना यही रहकर की थी,और पांडवो ने जीवन का अंतिम समय यही बिताया था। 


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